Shocking News NBFC पर संकट से घट सकती है

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IDEALSTOCK | गैर-बैकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) के लिए पैसा जुटाना मुश्किल हो गया है. उनकी कठिनाइयों का खामियाजा ऑटो कंपनियों को भुगतना पड़ सकता है. कार और दोपहिया खरीदने के लिए लोन लेने में ग्राहकों को दिक्कत आ सकती है.

लिक्विडिटी कम होने से ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री में फाइनेंसिंग के विकल्प घट रहे हैं. वित्त वर्ष 19 में ज्यादातर सूचीबद्ध ऑटो कंपनियों की ग्रोथ रेट दोहरे अंक में पहुंचने की उम्मीद थी. ज्यादातर कंपनियां पहली छमाही में यह ग्रोथ हासिल करने में कामयाब रहीं. मगर दूसरी छमाही में उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. दोपहिया वाहनों पर इसकी मार ज्यादा होगी. बीते पांच सालों से ऑटो लोन में एनबीएफसी की हिस्सेदारी काफी बढ़ी है. जगह-जगह एनबीएफसी की पहुंच ने पैसेंजर वाहन, ट्रैक्टर और कमर्शियल वाहनों की बिक्री बढ़ाई है.

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हालांकि, इस त्योहारी सीजन में एनबीएफसी ऑटो वाहन के ऑफर्स में कम दिलचस्पी दिखा रहे हैं. इससे उन कंपनियों की बिक्री पर करीब 10 से 15 फीसदी तक का असर पड़ सकता है. ऐसे में इस साल कमजोर पड़े ऑटो कंपनियों का पीई और भी ज्यादा घट सकता है. गौरतलब है कि इस साल ऑटो कंपनियों के शेयरों ने 12 से 56 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की है. टीवीएस मोटर्स को छोड़ दें, तो सभी दिग्गज ऑटो कंपनियों के पीई अनुपात, उनके दीर्घकालिक औसत के काफी नीचे खिसक आए हैं. क्रेडिट सुइस के अनुसार, वित्त वर्ष 14 तक सिर्फ 30 फीसदी दोपहिया वाहन ही लोन से खरीदे जाते थे. मगर वित्त वर्ष 18 तक यह आंकड़ा 50 फीसदी तक पहुंच गया. दूसरी तरफ, इस दौरान पैसेंजर गाड़ियों, ट्रैक्टर और कमर्शियल वाहनों की बिक्री में 5 फीसदी का इजाफा हुआ.

इस तेजी की मुख्य वजह एनबीएफसी है. दोपहिया वाहन कंपनियों की बिक्री में एनबीएफसी की हिस्सेदारी एक साल में 60 फीसदी बढ़ी है. पिछले पांचों में यह ग्रोथ 8 फीसदी रही है. इन कंपनियों ने 24 महीनों से कम अवधि
और छोटे कर्ज वाले लोन में भी दिलचस्पी बढ़ाई है. पैसेंजर वाहनों में फाइनेंसिंग स्तर 81 फीसदी तक है. हालांकि, कार सेगमेंट में यह हिस्सेदारी सिर्फ 17 फीसदी है. ट्रैक्टर सेगमेंट में एनबीएफसी की हिस्सेदारी काफी बेहतर है. इनके लिए प्रथामिकता के आधार पर कर्ज दिया जाता है. इसी वजह से बैंक इस कर्ज को आसानी से खरीद लेते हैं.

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दोपहिया वाहनों की वॉल्यूम की ग्रोथ कंपनियों के अपने फाइनेंस के स्रोत पर निर्भर करेगी. उनके लिए एनबीएफसी का विकल्प तलाशना एक चुनौती है. हीरो मोटोकॉर्प, बजाज ऑटो और टीवीएस मोटर्स के पास फाइनेंस के अपने स्रोत हैं. इसमें सबसे ज्यादा नुकसान आयशर मोटर्स को होने के आसार हैं.सितंबर तिमाही में हीरो मोटोकॉर्प के प्रबंधन ने कहा कि बिक्री में हीरो फिनकॉर्प की हिस्सेदारी 11 फीसदी है. वित्त वर्ष 19 तक कंपनी की वॉल्यूम ग्रोथ 8 से 10 फीसदी तक रहने की उम्मीद है. हीरो को अपने खुद के स्रोत पर विश्वास है, मगर यह दीर्घावधि हल नहीं है. प्राइम डेटाबेस के अनुसार, हीरो फिनकॉर्प ने अप्रैल 2018 में कमर्शियल पेपर के जरिए 670 करोड़ रुपये जुटाए थे, जिसके लिए 6.91 फीसदी की ब्याज दर निर्धारित की गई थी. इसके बाद कंपनी ने हाल ही में 9.25 फीसदी की  ब्याज दर पर 350 करोड़ रुपये जुटाए हैं.

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इसी तरह टीवीएस मोटर्स की टीवीएस क्रेडिट सर्विसेस ने अप्रैल 2018 में 7.19 फीसदी ब्याज की दर से पैसा जुटाया था. मगर सितंबर 2018 में कंपनी के लिए कर्ज की दर बढ़कर 8.24 फीसदी हो गई थी. कंपनी ने 100 करोड़
रुपये जुटाए थे.केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 13 से वित्त वर्ष 18 के दौरान वाहन लोन 11.3 फीसदी की वार्षिक दर से बढ़ कर 1.89 लाख करोड़ रुपये का स्तर पार कर चुका है. कुल कर्ज में वाहन लोन की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 13 में 1.92 फीसदी से बढ़कर वित्त वर्ष 18 में 2.47 फीसदी तक पहुंच गई है.

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